सस्ती शराब पर सरकार की नजर,घाटा पूर्ति के प्रयास
सस्ती शराब पर सरकार की नजर,घाटा पूर्ति के प्रयास
- प्रदेश का आबकारी विभाग देशी शराब बेच भरेगा खजाना
डा.एल.एन.वैष्णव
भोपाल /18/04/2016- मध्यप्रदेश में सरकार की नजर सस्ती देशी शराब पर है जिसको लेकर वह अपने कोष के घाटे की पूर्ति करने की नीति पर कार्य प्रारंभ कर चुकी है। उसका मानना है कि यही वह मार्ग है जिसके चलते वह अपने घाटे की भरपाई कर सकती है। ज्ञात हो कि प्रदेश सरकार की आबकारी नीति के चलते लगातार ठेकेदारों में ठेका लेने में अपनी रूची नहीं दिखा रहे थे और जिसके चलते इस बर्ष लगभग पांच अरब रूपयों का घाटा लगने की बात विभागीय सूत्र बतलाते हैं। इतने लम्बे घाटे की पूर्ति करने के लिये सरकार लगातार चिंतन मनन करने में लगी हुई है जिसके लिये उसने अब सस्ती देशी शराब की ओर रूख करना आवश्यक समझा है। विदित हो कि हाल ही में विदेशी शराब के मूल्य में 30 प्रतिशत का ईजाफा करने के कारण सुरा के शौकीन लोगों ने देशी शराब का सेवन करने में रूची दिखाना प्रारंभ कर दिया है जिसकी संख्या अधिक बतलायी जाती है। जिसके चलते अवैध रूप से शराब बनाने बेचने वालों के साथ ही घटिया प्रकार के शराब बनाने वालों की जमकर चांदी होने लगी है। सूत्र बतलाते हैं कि इन पर लगाम लगाने तथा कोष के घाटे में देशी शराब एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है। जानकारी के मुताबिक सरकार शीघ्र ही इस दिशा में अपना कदम आगे बढाने जा रही है।
क्या है शराब महंगी होने के कारण-
लगातार शराब महंगी होने के कारण तलासने पर संबधित विभाग के साथ ही इस व्यवसाय में लगे अनुभवी लोगों की माने तो इसके पीछे के कई कारण बतलाये जाते हैं। जिनमें प्रमुख बात है कि आमतौर पर जिनकी कंपनी के ब्रांड का मूल्य आठ सौ रूपये से अधिक होता है वह ही रजिस्टर्ड किये जाते हैं। जानकारों की माने तो इसके कारण गुणवत्ता वाली शराब आठ सौ रूपयेे से उपर कीमत की ही होती है। प्रदेश सरकार का आबकारी विभाग इस पर कर के रूप में 270 रूपये वसूलता था परन्तु अब यह 370 रूपये हो गया है। क्योंकि सरकार ने 100 रूपये की बढोत्तरी कर दी है। यही एक बढा कारण सामने आ रहा है कि देशी सस्ती शराब के प्रति सुरा प्रेमियों का रूझान बढने लगा है।
नयी नीति,ठेकेदारों की रूचि नहीं-
विदित हो प्रदेश सरकार के संबधित विभाग द्वारा वर्ष 2016-17 के लिए नवीन आबकारी नीति बनाते समय ही यह तय कर लिया था। जिसके तहत वह इस बार देशी एवं स्थानीय के साथ ही कम मूल्य वाली शराब बनाने वालों को लाभांवित करने के नियम बनाने की दिशा में सोचने लगी थी। शायद यही एक कारण माना जा रहा है कि देशी शराब पर आबकारी ड्यूटी में इजाफा नहीं किया गया। जबकि विदेशी शराब के लिये एैसा नहीं किया गया इस पर पांच प्रतिशत टेक्स की बढोत्तरी कर दी गयी। ठेकेदारों ने शायद इसी बात को लेकर आशंकित होते हुये ठेकों को लेने में अपनी रूची नहीं दिखाई जिसके चलते सरकार को एक बढा घाटा लगा। सूत्र तो यहां तक बतलाते हैं कि ठेकेदारों को प्रलोभन के साथ ही सहूलियतों को देने का प्रयास सरकार द्वारा किये गये परन्तु ठेकों के द्वारा आये परिणाम से सरकार की चिंता बढा दी एवं आज की स्थिति में एैसी दुकानों की संख्या में भी इजाफा हो गया जिसमें सरकार को स्वयं शराब दुकाने चलाने मजबूर होना पडा है।
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