ज्ञान,विज्ञान,तंत्र के साथ धर्म,आस्था का अनूठा संगम
- ज्ञान,विज्ञान,तंत्र के साथ धर्म,आस्था का अनूठा संगम
- उज्जयिनी का ऐतिहासिक,धार्मिक महत्व एवं सिंहस्थ
डा.लक्ष्मीनारायण वैष्णव
उज्जैन/27/04/2016 ज्ञान,विज्ञान के साथ ही तंत्र और फिर धर्म,आस्था का अनूठा संगम यहां दिखलाई देता है जहां शिक्षा प्राप्त करने के लिये योगीराज श्रीकृष्ण ने एक लम्बा समय यहां व्यतीत कर गुरू से शिक्षा दीक्षा प्राप्त की। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भाई बलराम अपने सखा सुदामा के साथ तपोनिष्ठ महर्षि सान्दीपनी से धनुर्विद्या, अस्त्र, मंत्रोपनिषद, गज, अश्वारोहण सहित 64 कला का ज्ञान प्राप्त किया था। धार्मिक ग्रन्थों एवं इतिहास के अनुसार योगीराज भगवान श्रीकृष्ण ने 126 दिवस उक्त ज्ञान को प्राप्त अपने गुरूवर से प्राप्त किया था। एक ऐतीहासिक नगरी के दर्शन करने तथा नजदीकि से जानने समझने का सौभाग्य इस समय लाखों लोग प्राप्त कर रहे हैं। देश ही नहीं विश्व के कौने-कौने से सिंहस्थ में श्रृद्धालू यहां अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगे हुये हैं। धर्म एवं इतिहास के जानकारों के अनुसार उज्जैन,जिसको कालांतर में उज्जयिनी नगरी के नाम से पहचाना जाता था शिक्षा-स्थली के रूप में नालंदा तथा काशी के पूर्व से ही स्थापित रही है।
उज्जैयिनी और चौरासी शिव-
प्राचीन एवं धार्मिक रूप से पहचानी जानी वाली उज्जयिनी नगरी का महत्व जहां ज्ञान,विज्ञान,अध्यात्म,कला को लेकर पहचाना जाता है तो वहीं दूसरी ओर यहां पर 84 शिव लिंग की स्थापना महाकाल के साथ होने और इसका अलग-अलग महत्व बतलाया गया है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार यहां पर क्रमश:अगस्तेश्वर,गुहेश्ववर,ढुढेश्वर,डमरूकेश्वर,अनादिकलपेश्वर,स्वर्ण लेश्वर,त्रिविष्टेश्वर,कपालेश्वर,स्वर्गद्वारेश्वर,कर्कोटकेश्वर,सिद्धेश्वर,लोकपालेश्वर,कामेश्वर,कुटुम्बेश्वर,इन्द्रद्युम्रेश्वर,ईशानेश्वर,अप्सरेश्वर,कलकलेश्वर,नागचके्रश्वर,प्रतिहारेश्वर,कुक्टेश्वर,कर्कटेश्वर,मेघनादेश्वर,महालेश्वर,मुक्तेश्वर,सोमेश्वर,अनरकेश्वर,जटेश्वर,रामेश्वर,च्वनेश्वर,खण्डेश्वर,पत्नेश्वर,आनदेश्वर,कन्थदेश्वर,इंद्रेश्वर,मार्कण्डेश्वर,शिवेश्वर,कुसुमेश्वर,अकेश्वर,कुण्डेश्वर,लुम्पेश्वर,,गंगेश्वर,अंगारेश्वर,उत्तरेश्वर,त्रिलोचनेश्वर,वीरेश्वर,नूपरेश्वर,अभयेश्वर,पृथुकेश्वर,स्थावरेश्वर,शूलेश्वर,ओंकारेश्वर,विश्वेश्वर,कंटेश्वर,ङ्क्षसहश्वर,रेवन्तश्वर,घंटेश्वर,प्रयागेश्वर,सिद्धेश्वर,मातंगश्वेर,सौभाग्येश्वर,रूपकेश्वर,धनु:सहास्त्रेश्वर,पशुपतेश्वर,ब्रम्हेश्वर,जलपेश्वर,केदारेश्वर,पिशाच मुक्तेश्वर,संगमेश्वर,दुर्घरेश्वर,प्रयोगेश्वर,चन्द्रादित्येश्वर,करमैश्वर,राजस्लेश्वर,बडलेश्वर,अरूणेश्वर,पुष्पदंतेश्वर,अविमुक्तेश्वर,हनुमंत्केश्वर,स्वप्रेश्वर,पिंगलेश्वर,कायावरोहलेश्वर,बिल्पेश्वर एवं दुर्दरेश्वर के मंदिर स्थापित हैं।
तंत्र साधना का केन्द्र-
उज्जयिनी शैव शाक्त तथा तान्त्रिक साधना का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र होने की बात सामने आती है। यद्यपि श्रीवैष्णव सम्प्रदाय सहित अन्य पंथों के मनीषियों का भी विशेष योगदान एवं साधना का केन्द्र बिन्दु यहां रहा है। पुराणों में अवन्ति जनपद को प्राय:महाकाल वन:के नाम से अभिहित किया गया है। यह भी लिखा गया है कि इस महाकाल वन में छियासठ करोड़ शिवलिंग स्थापित होने की बात भी प्रकाश में आती है। स्कन्द पुराण, देवी भागवत, वायु पुराण, अग्नि पुराण, मत्स्य पुराण और शिव पुराण में ज्योर्तिलिंगों की संख्या पाँच, आठ तथा बारह बतायी गई है। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इन सभी पुराणों में उज्जयिनी के महाकाल की गणना की गई है। धर्म के जानकारों के अनुसार स्कन्द पुराण के अनुसार तो अवन्ति के देव-अध्यक्ष के रूप में शिव स्वयं ही आसीन रहे हैं। उन्होंने त्रिपुरी के राक्षस को युद्ध में परास्त करने के पश्चात् ही इसका नाम अवन्ती से बदलकर उज्जयिनी कर दिया था। मत्स्य पुराण के अनुसार भी महाकाल वन के समीप ही शिव का अन्धकासुर के साथ युद्ध हुआ था। इस युद्ध के समय ही शिव ने काली, महाकाली आदि सप्त मातृकाओं की सृष्टि की थी। इसी क्रम में परवर्ती काल में शैव सम्प्रदाय जब विविध साधना पद्धतियों के आधार पर अनेक शाखाओं में विभक्त हो गया तब भी प्राय: सभी शाखाओं के केन्द्र इस क्षेत्र में अवस्थित रहे थे। कापालिक मत भी एक उग्र शैव तान्त्रिक सम्प्रदाय रहा है। शिव पुराण में इनको महाव्रत धर कहा गया है। आद्य शंकराचार्य के समय में उज्जयिनी कापालिकों का केन्द्र रहा है। शैव तान्त्रिकों में वीर शैवो का भी एक प्रमुख सम्प्रदाय रहा है। इसी को लिंगायत सम्प्रदाय के नाम से जाना जाता है। इसके अनुयायियों की मान्यता है कि पाँच शिवलिंगों से रेणुकाचार्य, दारुकाचार्य, एकोरामाचार्य, पण्डिताराध्य और विश्वाराध्य नामक महापुरुषों का अविर्भाव हुआ था। इन्होंने क्रमश: मैसूर, उज्जैन, केदारनाथ, श्री शैल और काशी में अपनी पीठों की स्थापना कर इस सम्प्रदाय का प्रचार किया था।
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