उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

 अवैधानिक, खुला मांस विक्रय पर उच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला

 

                                                                                डा.एल.एन.वैष्णव

जबलपुर/माननीय उच्चन्यायालय द्वारा दिये गये एक ऐतीहासिक फैसले के अनुसार अब अवैधानिक रूप से खुले में मांस का विक्रय नहीं किया जा सकेगा। डब्लू पी 15800/2012 पर सुनवाई करते हुये दिये गये निर्णय के चलते अब प्रदेश में कहीं भी खुले में मांस विक्रय नहीं किया जा सकता है। इसी के चलते प्रदेश भर के कलेक्ट्ररों को आदेश की प्रतियां प्राप्त होते ही कार्यवाही प्रारंभ होने करने संकेत प्राप्त होने लगे हैं। ज्ञात हो कि गली-गली में मांस,अंडे,मुर्गे,मुर्गियों के मांस का विक्रय किया जा रहा था । जबकि एैसा किया जाना संबधित विभाग के कानून की मंशा के विपरीत भी बतलाया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार  नगर निगम अधिनियम 1956 के सेक्सन 255 एवं 257 तथा खाद्य अपमिश्रण अधिनियम 1955 के रूल 50 में विहित प्रावधान के तहत विधिवत अनुज्ञप्ति हासिल किये बिना उक्त चीजों का निगम सीमा मेें विक्रय नहीं किया जा सकता है यह दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आता है। परन्तु क्या हो रहा था एवं कितनी कार्यवाही हुई सर्व विदित है? वहीं बिना एन्टीमार्टम पशु वध एवं उसका मांस विक्रय भी बडे अपराध को बतलाता है। जानकारों की माने तो डाक्टरी भाषा मे इसे 'एन्टीमार्टमÓ कहा जाता है इसके बिना न तो उन पशुओं का वध किया जाता है जो मनुष्यों के खाये जाने योग्य बतलाया गया है एवं न ही मांस का विक्रय किया जाता है। नियमों के जानकारों की माने तो कत्लखाने में ले जाने के पूर्व नगर पालिका का अधिकारी उस पशु को पशु चिकित्सक के पास स्वास्थ्य परीक्षण के लिये ले जाता है उसके परीक्षण प्रमाण पत्र के आधार पर ही उसका वध किया जा सकता है। अगर वह इसकी सिफारिश नहीं करता तो पशु का न तो वध किया जा सकता है न ही उसका मांस विक्रय किया जा सकता है। उलंघन करने वालों के लिये दण्ड के प्रावधान बतलाये गये हैं। देखा जाये तो सारे नियमों को बलाये ताक रख कार्य किया जा रहा था जिसको लेकर एक याचिका पर सुनवाई करते हुये माननीय उच्च न्यायालय ने एक ऐतीहासिक फैसले में नियम विरूद्ध कार्य करने वालों के विरूद्ध कार्यवाही करने के निर्देश अपने महत्वपूर्ण आदेश में दिये हैं। 

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