मन,विचार,कर्म में राष्ट्रहित भाव को ले हो पत्रकारिता-हितेश शंकर

मन,विचार,कर्म में राष्ट्रहित भाव को ले हो पत्रकारिता-हितेश शंकर 

  • श्रीगुरूजी व्याख्यान माला ,वक्ताओं ने राष्ट्रवाद बनाम मीडिया पर ने रखे विचार 
  •     विचार,तर्कों के साथ बात रख,चिंतन करने हितेष ने किया मजबूर

                                                          (  डा.लक्ष्मीनारायण वैष्णव )

दमोह/30-04-2016-राष्ट्रीय हो जाना मेरे मन,विचार,कर्म में यह भाव हो और जो में कर रहा हूं वह देश समाज,राष्ट्र के हित में हैं यह बात ही राष्ट्रवाद है इसलिये हम पत्रकारों को इस दिशा में सोचते हुये पत्रकारिता करते हुये समाज के सामने एैसी खबरों का प्रकाशन करना चाहिये जो समाज,राष्ट्र को जोडने वाली हों तोडने वाली नहीं यह बात पांचजन्य के संपादक हितेश शंकर ने कही। स्थानीय मानस भवन में श्रीगुरूजी व्याख्यान माला के नवमेंं बर्ष के प्रथम दिवस में प्रथम वक्ता के रूप में उपस्थित होकर इन्होने राष्ट्रवाद बनाम मीडिया पर अपने विचारों को रखा। लगभग एक घंटे के व्याख्यान में अनेक वह क्षण भी आये जब उपस्थित विशाल जन समूह तालियां बजा रहा था तो वहीं चिंतन करने मजबूर हो रहा था। श्री शंकर ने बहुत ही बेबाकी एवं तर्कों के साथ अपनी बात को रखते हुये सबको आईना दिखलाने का कार्य किया। इन्होने कहा कि  वर्तमान में जो राष्ट्रवाद को लेकर बहस चल रही है उसको लेकर मेरा मानना है कि यह राष्ट्रवाद की नहीं अपितु राष्ट्रीय होने की बहस है? क्योंकि राष्ट्र के बारे में वाद ही नहीं है जो विवाद का कारण बने परन्तु जबरन में विषय को भटकाया जा रहा है।  क्या प्राईम टाईम शो में जो खबरें चलायी जा रही हैं क्या उसकी टीआरपी यह तय करेगी कि यह राष्ट्रीय विषय है तो मेरा मानना है कि इस प्रकार से राष्ट्रीय विषयों के साथ अन्याय होगा ? पिछले कुछ समय से कुछ बडे विषयों को छोटे विषयों से जोडने का अपराध मीडिया से हुआ है। 

पत्रकारिता खुराक बदली या वही? -

इन्होने कहा कि पत्रकारिता में लगातार कडी मेहनत है तो रोज कुंआ खोद पानी पीना भी है वहीं सच के लिये लगातार लडने के लिये संघर्ष भी है। समाचारों के लिये लगातार लडाई लडनी पडती है और जीतना भी पडती है। खबरों का प्रकाशन वह भी उचित पृष्ठ पर वाईलाईन यह मेरा मानना है कि एक असली पत्रकार की खुराक होती है परन्तु क्या खुराक बदल गयी है?या वही है यह चिंतन का विषय है? एक बूंद खटास दूध को फाड देती है समाज को तोडने वाली खबरों को क्या हम पत्रकारिता कह सकते हैं? पत्रकारिता तो विशुद्ध राष्ट्रीय होती है। हमारी पत्रकारिता का चरित्र क्या था वह था राष्ट्रवाद देखा जाये तो देश की आजादी में भाग लेने वाले अधिकांश पत्रकार ही रहे हैं। परन्तु ट्रांसफर ऑफ पॉवर को कुछ लोगों ने 15 अगस्त 1947 से देश निर्माताओं के नाम जोडा इन्होने इनको नेशनल हीरो बनाया जो मेरी नजर में गलत था? अगर आजादी की लडाई में लगे लोगों को यह बतलाया दिया जाता कि लडाई तुम लडो और देश हम बनायेंगे तो शायद परिणाम कुछ और होता? देश के आजादी के लिये जहां पत्रकारिता एक अलग जज्बे के साथ एक लक्ष्य को लेकर लडी जा रही थी वह आजादी के बाद बदली। आजादी के पूर्व यह आव्हान करती थी देश भक्ति के साथ आक्रांताओं को अपने उपर हटाने में लडने का यह प्रथम पडाव पत्रकारिता का था जबकि दूसरे में आजादी के बाद क्या छपेगा किसके लिये किसके विरूद्ध यह तय करना रहा। देखा जाये तो पत्रकारिता का स्वर यहां से बदलना प्रारंभ हुआ। 

1948 में प्रथम घौटाल कांगे्स ने किया-

हितेश शंकर ने कहा कि पत्रकारिता जहां यह निर्णय कर रही थी कि आजादी के बाद क्या छपना चाहिये और किसके विरूद्ध तो उसी समय 1948 में एक बडे घोटाले की खबर इस समय के समाचार पत्रों के प्रथम पृष्ठ पर छपती है। अभिलेखागारों में इस समय के समाचार पत्र मौजूद हैं जिसमें आजाद भारत का प्रथम घोटाल कांग्रेस के नाम से दर्ज है। कहने का मतलब आजादी जितनी पुरानी है घोटाले की कहानी जो यह बतलाते हैं कि कितनी बेशर्म हो गयी थी इस समय राजनीति? जिस कांग्रेस ने प्रथम घोटाला किया तो वह आगे इतनी उद्दंड हो गयी कि आपात काल में देश को झोंक दिया। संपादक के अधिकारों पर अधिकारियों का पहरा वही तय करने लगा कि क्या छपेगा क्या नहीं। इसी समय से खबरों के प्रकाशन में कुछ परिवर्तन हुआ। इस समय पर विचार की जगह विज्ञापनों ने लेना प्रारंभ किया तो चिंतन करते हुये 1948 में मकर संक्राति के दिन पं.दीनदयाल उपाध्याय ने पं.अटल बिहारी बाजपेयी को पांचजन्य समाचार पत्र का प्रथम संपादक बनाते हुये पत्र की स्थापना की। तभी से इसकी की न तो धार बदली न धारा सिर्फ राष्ट्रवाद ही मुख्य लक्ष्य है। 

 धरती के लालों को ललकारता लाल सलाम-

आपातकाल के बाद ही पत्रकारिता में कुछ ओर परिवर्तन प्रारंभ हुआ जिसमें एक विचारधारा को आगे लेकर चलने वाले प्रथम पेज से लेकर महत्वपूर्ण पृष्ठों पर सरकार के विरूद्ध तथा राष्ट्र के विरोध की खबरों को स्थान देने लगे। श्री शंकर ने कहा कि इसी समय से राष्ट्रवाद खबरों से गायब होना प्रारंभ हुआ। राष्ट्रवाद को तिलक,भगवा,संघी जैसी चीज के रूप में प्रस्तुत करने लगे जबकि मानव अधिकार को आगे लाना प्रारंभ हुआ जिसमें मरने मारने वाले दोनो के लिये स्थान है। जिसके चलते फौजी,जवान पीछे और नक्सल वादी,आंतकवादी आगे आते गये। परिणाम लाल सलाम वाले अब धरती के लालों को ललकारने लगे। 

वंदे मातरम् कोई कार्ड नहीं-

हितेश शंकर ने कहा कि यह देश उस कृष्ण का है जिसने अर्जुन को ज्ञान दिया कंस का वध किया राष्ट्र के लिये गोवर्धन उठाया धरती के लालों का यही कृष्ण है। इन्होने कहा कि वंदे मात्रम कोई ग्रीन,आधारकार्ड,बीजा,पासपोर्ट नहीं है हम एक प्रश्र पूंछना चाहते हैं कि क्या मां का सम्मान करने वालों के साथ आप हैं या फिर टुकडे देखने वालों के साथ?मानवीयता का दर्शन हमारे पुरखों,ऋषियों ने हमें दिया है जिसने प्रत्येक कण में भगवान का वास होना माना है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में इन्होने कहा कि महात्मा गांधी एवं डा.अंबेडकर दोनो ही शाखा में जा चुके हैं यह बात 1938 की है। जहां इन्होने स्वयं संघ कार्यो की सराहना की थी। बाबा हमारे भी हैं सबके हैं किसी एक के नहीं है। इन्होने कहा कि पत्रकारिता करने वाले कुछ लोग एजेंडा लेकर कार्य करते हैं जो मेरे विचार से गलत है? अगर आप सवाल पूंछते हैं तो दूसरों को भी पूंछने का भी मौका दो? आपकी संपत्ति की जांच क्यों नहीं होना चाहिये? आप तो सरस्वती की लडाई लडने निकले थे लक्ष्मी की तरफ कैसे मुड गये?

इन्होने भी रखे विचार-

व्याख्यान माला का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन के साथ मंचासीन अतिथियों ने किया तो वहीं सरस्वती वंदना नवोदित निगम ने प्रस्तुत की। अतिथियों की मानवंदना के साथ प्रतिवेदन सुधीर सर्पे एवं परिचय कणाद खरे ने प्रस्तुत किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभाग कार्यवाह रामलाल जी ने कहा कि कौन सा विषय कब,कहां रखना है वह राष्ट्र भाव को पुष्ट करने वाला है कि नहीं यह सोचना आवश्यक है। हाल ही में उत्पन्न हुये भारत माता की जय बोलना सिखलाने वाले सरसंघ चालक मोहन भागवत के वाक्य पर कहा कि राष्ट, समाज का नेतृत्व करने वाले लोग कम शब्दों में अधिक बात करने का प्रयास करते हैं। परन्तु मीडिया को इसको अपने तरीके से प्रस्तुत करना ठीक नहीं है। भारत माता की जय,मादरे वतन,हिन्दुस्थान जिन्दाबाद,वंदे मातरमॅ् में सिर्फ भावार्थ का अंतर है परन्तु यहां यह सोचना आवश्यक है कि इसमें किसी के भाव अलग तो नहीं है? अगर एक हैं तो शब्दार्थ से कोई फर्क नहीं पडता है। ठा.नारायण सिंह मीडिया की भूमिका एवं राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखते हुये गागर में सागर भर अपनी बात रखी। वंदे मातरम् के गायन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। 



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