शिव का आरक्षण प्रेम


 शिव का आरक्षण प्रेम,प्रदेश में बनते बिगडते समीकरण 

                                                    डा.एल.एन.वैष्णव


भोपाल/ मध्यप्रदेश में इस समय राजनैतिक सरगर्मियां और उपर से आरक्षण को लेकर चल रही हवा लगातार माहौल में गर्मी को बनाये हुये है। मामला एक एैसे विषय से जुडा हुआ है जिसमें नियम और कानून दोनो को एक ही नजरिये से देखा और प्रस्तुत करने का प्रयास किया जा रहा है। जिसको लेकर दो पक्ष आमने सामने दिखलायी देते हैं वहीं माननीय उच्च न्यायालय के द्वारा दिये गये फैसले और सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन प्रकरण के बाद भी प्रदेश के मुखिया के बयान और पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन कुछ अलग कहानी कहता नजर आता है। जानकार बतलाते हैं कि यह एक एैसा मामला है जो शिव पर भारी पड सकता है क्योंकि यह वह नंगी तलवार तो है ही साथ में दोनो तरफ धार वाली भी है जरा चुके और गये काम से? न्यायपालिका में विचाराधीन मामले को बयान बाजी के साथ चुनौति देना और साथ ही यह घोषणा करना कि  'पदोन्नति में आरक्षण पर कोई माई का लाल, रोक नहीं लगा सकताÓ ने प्रदेश में वर्ग संघर्ष की स्थिति को खडी होने लगी है? कर्मचारियों की बात करें या फिर आम जनमानस में दोनो जगह अब चर्चाओं के साथ सरकार की मंशा को लेकर सवालिया निशान लगने लगे हैं। शिक्षा एवं शासकीय सेवा में आरक्षण की बात तो अलग है यह बहस का मुद्दा नहीं है,परन्तु पदोन्नती में आरक्षण की बात से न तो कानून और न ही सवर्ण वर्ग सहमत दिखलायी देता है। लेकिन एैसे मसले पर दिये गये बयान को राजनैतिक लाभ के लिये दिया गया बयान जरूर माना जा सकता है एैसा जानकार बतलाते हैं।
                               प्रदेश इस समय एक एैसे मोड पर खडा हो गया है जहां से दो वर्ग आमने-सामने आ गये हैं और सरकार अपने बयान से कानून ने जिसको सही माना उसके साथ नहीं अपितु सामने खडी हो गयी है? परन्तु जानकार बतलाते हैं कि यह मामला थोडी सी चूक में भारी पड सकता है सरकार एवं पार्टी दोनो के लिये? कानून के जानकार बतलाते हैं कि किसी मामले में न्यायालय का स्थगन आदेश फैसला नहीं है वह कुछ समय के लिये रोक है। परन्तु यहां तो कहानी कुछ और सामने आने लगी है जहां सर्वोच्च न्यायालय में प्रकरण विचाराधीन हो और राज्य सरकार फैसले के पूर्व ही बयानबाजी करे? ज्ञात हो कि  मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आरक्षण संबंधी नियमों में आमूल-चूल परिवर्तन करने घोषणा कर डाली है। दूसरी ओर जो वर्ग पदोन्नती में आरक्षण के विरोध को लेकर न्यायालय में गया हुआ है ने न्यायालय की अवमानना को लेकर कंटेम्प्ट प्रस्तुत कर दिया है। 

नियम और कानून में अंतर-

 नियम प्रशासनिक जबकि अनुच्छेद कानून दोनो में अंतर समझना आवश्यक है परन्तु यहां दोनो में समानता को प्रस्तुत करना या तो अज्ञानता दिखलायी देती है या फिर राजनैतिक मंशा को लेकर अपने ढंग से प्रस्तुति। कानून के जानकारों के अनुसार नियम प्रशासनिक होते हैं जबकि कानून अलग बात है। संविधान का कोई भी अनुच्छेद पदोन्नति में आरक्षण की सिफारिश नहीं करता। इसी बात को लेकर न्यायालय ने अपना फैसला दिया हुआ है और सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है। 

मुद्दा कोई नया नहीं -

आरक्षण के मामले में मंडल कमंडल के मामले को कौन नहीं जानता जिसकी आग ने पूरे देश को अपनी आगोश में ले लिया था। तत्कालीन प्रधान मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के आरक्षण प्रेम ने न जाने कितने दिनो तक यह आग देश में सुलगती रही थी। कानून के जानकारों के अनुसार राजनीति के लिये इस प्रेम को लेकर नेताओं ने रोटियां सेंकने के लगातार प्रयास किये हैं। जिसमें से शिव का यह प्रेम भी माना जा रहा है जो अचानक बाहर आ गया है। 

विरोधी एक जुट बढ सकती हैं मुश्किलें-

पदोन्नति में आरक्षण का विरोध करने वाले कर्मचारी एवं उनके समर्थक एक साथ खडे हो चुके हैं। जो एक बडे संकट जो कि भाजपा एवं प्रदेश सरकार के सामने खडा हो सकता है के संकेत देने लगा है। 
संपर्क,बैठकों,ज्ञापनो,अपनी बात को पुरजोर तरीके से रखने और माहौल को अपने पक्ष में करने तथा सरकार के विरूद्ध करने मेंं मिलती सफलता कुछ अलग कहानी कहने लगी है। हालांकि सूत्र बतलाते हैं कि भाजपा के साथ ही सरकार का एक बडा भाग इससे चिंतित भी दिखलायी दे रहा है? सर्वणों की पार्टी भाजपा को माना जाता था लेकिन शिव के बयान से अलग जमीन एवं योजना बनाने की दिशा में सर्वण तैयार होने लगे हैं। पार्टी के अंदर उभरते स्वर रीवां में हुई बैठक में सामने आ ही गये हैं यह बात अलग है कि इसको दबाने का प्रयास किया गया हो? 

दलितों को पुरोहित बनाने की घोषणा आग में घी-

राज्य के मुख्य मंत्री श्री चौहान का यह बयान कि दलितों को पुरोहित बनाया जायेगा ने आग में घी डालने का कार्य किया। पूरे देश में विरोध और ज्ञापनो का सिलसिला चला तथा सर्वण लामबंद होते गये। धर्म के जानकारों का मानना है कि सरकार का कार्य शासन करना है वह बुनियादी सुविधायें लोगों को कैसे मिलें इस पर कार्य करे जबकि धर्म से जुडे मामलों में धर्माचार्यो को निर्णय लेने का अधिकार होता है। शिव की इस घोषणा से भाजपा एवं सरकार के प्रति सर्वणों का आक्रोश और बढ गया । मामला तो यहां तक देखा गया कि जो सर्वण सत्ता एवं संगठन में कार्य कर रहे हैं को इस मुद्दे पर जनता के सवाल जबाब में मुश्किलों को सामना करना पड रहा है। 

कहां है निशाना-

जानकार बतलाते हैं कि सरकार और पार्टी के सामने निश्चित रूप से कोई एैसा संकट खडा हो गया है जिसको लेकर प्रदेश के मुखिया आशंकित हैं? वह इस बात को सार्वजनिक नहीं कर पा रहे है और अंदरूनी रूप से मुश्किल में होने से एैसी बयान बाजी करने में लगे हुये हैं? प्रदेश दो सौ तीस विधान सभा सीटें हैं। जिनमें से 35 अनुसूचित जाति वर्ग तथा अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिये 47 यानि 82 सीटें आरक्षित रखी गयी हैं। विधानसभा की 230 सीटों पर आम निर्वाचन होने की स्थिति में सरकार बनाने के लिये किसी भी राजनैतिक दल को एक सौ सौलह सीटों पर विजय प्राप्त होने की आवश्यकता होती है। वर्तमान सरकार में आरक्षित 47 में से 32  वहीं दूसरी ओर अनुसूचित जाति वर्ग की 35 सीटों में से 28 पर बीजेपी के विधायक यानि 82 में 60 पर भाजपा का कब्जा है। 

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