अनुभव और रणनीति ने दिलाई कमलनाथ को सफलता
भाजपा में नींव के पत्थरों का अपमान,कंगूरों का सम्मान बना पराजय का कारण
डा.लक्ष्मीनारायण वैष्णव
भोपाल/ 23/12/2018/मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के किले को भेदने में कांग्रेस को मिली सफलता को लेकर इस समय चर्चाओं का बाजार गर्म है। तरह -तरह की बातें सामने आ रही हैं परन्तु अगर राजनीति के जानकारों की माने तो इसमें कमलनाथ का अनुभव,रणनीति और समय पर निर्णय लेना,कार्यकर्ताओं मंें एकजुटता बनाये रखना प्रमुख माना जा रहा है। जबकि सर्वाधिक विकास एवं जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन कर जन को लाभ दिलाने के बाद भी भाजपा अपने किले को बचाने में नाकामयाब रही। वोट बैंक में वह कांग्रेस से आगे रही फिर भी बहुमत से चंद कदम दूर उसका विजय रथ रूक गया। जिसके पीछे के कारणों पर नजर डालें तो जो प्रमुखता से सामने आता है वह कार्यकर्ताओं को अनेक जगहों पर एकत्रित करने में नाकामयाब रही जिसके चलते अनेक कार्यकर्ता तटस्थ दिखलाई दिये। कांग्रेस इस समय सत्तारूढ हो चुकी है और भाजपा की 15 बर्ष की एन्टी इनकम्बेंसी का लाभ उसने उठाने में उसने सफलता प्राप्त कर ली है।
कमल और ज्योति ने राह की आसान-
मध्यप्रदेश में अनुभवी कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोडी ने भाजपा के गढ में सेंध आखिर लगा ली। ज्ञात हो कि शिवराज सिंह चैहान भाजपा का चेहरा बनकर नेतृत्व कर रहे थे तो वहीं कांग्रेस सत्ता कैसे प्राप्त हो इसके लिये लगातार कार्य रही थी। कांग्रेस ने प्रदेश में किसी भी नेता को मुख्य मंत्री का चेहरा नहीं बनाया था और सभी को आश्वासन रहा कि जीतने पर आपको-आपको कमान सौंपी जायेगी। नेताओं के खेमें और उनके समर्थक इसी विषय और विश्वास को लेकर कार्य रहे थे कि उनका नेता मुख्य मंत्री बनने वाला है। प्रदेश में प्रचार की कमान कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी ने संभाल रखी थी। कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने एक रणनीति के तहत कार्य किया कार्यकर्ताओं में जोश भरा,भाजपा की योजनाओं और नारों की तोड निकाली तो दिग्विजय सिंह को कोई बयान न देने और संगठन के कार्य में लगा अनुभव का लाभ उठाया।
नाथ का चक्र और व्यूह में फंसी भाजपा-
अनुभवी नेता कमलनाथ ने जो चुनावी चक्रव्यूह तैयार किया उसमें वह भाजपा को फंसाने के साथ ही कांग्रेस के 15 बर्षीय वनवास को खत्म करने में सफल हो गये। अबकी बार 200 पार के नारे को देकर चुनाव में उतरी भारतीय जनता पार्टी को चिंतन और मनन करने के लिये वह लगातार मजबूर करते देखे गये। बंुदेलखंड के अनुभवी और पकड रखने वाले वरिष्ठ नेता सत्यव्रत चतुर्वेदी की बातों और योजना की परवाह न करते हुये कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को जीत का लक्ष्य लेकर आगे बढने की प्रेरणा दी। वक्त है बदलाव का और गुस्सा आता है जैसे जुबान और दिल दिमाग में आने वाले नारों को दिया। और लगातार किसानों की बातों को सामने रखते हुये उनका सच्चा हितेषी बतलाने में भी कामयाब होते देखे गये। अगर राजनीति के जानकारों की माने तो मिशन-2018 विधानसभा का चुनाव शिवराज चैहान के लिए ही परीक्षा की घडी नहीं थी अपितु कमलनाथ एवं ज्योतिरादित्य की आम जनमानस में लोकप्रियता एवं राहुल गांधी के लिये एक अपनी काबलियत सिद्ध करने का अवसर भी था। कमलनाथ ने ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, विवेक तनखा, अजय सिंह, सुरेश पचैरी, अरुण यादव, जीतू पटवारी, सुरेंद्र चैधरी, रामनिवास रावत और बाला बच्चन,शोभा ओझा को नजरअंदाज नहीं किया,अपितु इनका साथ लेते हुये जीत का मार्ग आसान बनाया ।
मामा की छबि और कांग्रेस का वचन पत्र-
कमलनाथ ने शिवराज सिंह चैहान के मामा छवि को जनता के बीच से धीरे धीरे धूमिल करने का प्रयास किया। प्रदेश की 230 विधानसभा सीटों के लिये अलग-अलग रणनीति को तैसार किया। ग्रामों और नगर की अलग अलग समस्याओं को देखा और समझा और उसके हिसाब से वचनपत्र और नारे,भाषणों की रूप रेखा तैयार की गयी। भाजपा के प्रति लोगों की नाराजगी को मत में परिवर्तित करने के वह सभी कार्य किये गये जो होना चाहिये। जनता की उम्मीदों के आधार पर वचन पत्र के बिंदु तैयार करते हुये सामने रखा गया। विभिन्न समाज केे-महिला, छात्रों, युवाओं, बुजुर्गों एवं व्यवसाईयों चर्चा और मंथन किया। भाजपा के दृष्टि पत्र से अलग अपने वचन पत्र में जोडे जिसमें किसानों की कर्ज माफी वाले वचन में जीत की राह आसान की।
नींव के पत्थरों का अपमान-कंगूरों का सम्मान-
भारतीय जनता पार्टी के किले को भेदने में कांग्रेस अगर कामयाब हो पायी तो उसके पीछे का एक बडा कारण यह भी प्रमुख रूप से सामने आया है जिसमें जहां भारतीय जनता पार्टी पार्टी के कर्मठ जमीनी कार्यकर्ता जिन्हे नींव के पत्थर कहा जाता है अनेक जगहों पर उपेक्षा और नये सेल्फी पुत्रों जैसे कंगूरों का सम्मान है। जिसके चलते भाजपा के कर्मठ और जमीन स्तर के कार्यकर्ता तटस्थ अनेक जगहों पर हो गये। जबकि बडा चिंतन का विषय तो यह बना हुआ है कि केन्द्र एवं प्रदेश सरकार द्वारा अनेेक जनकल्याणकारी योजनाओं का संचालन करने तथा समस्त वर्ग समुदायों को ध्यान में रख कार्य करने तथा लाभ दिलाने के बाद भी नकारात्मक माहौल के पीछे का कारण क्या है? उसमें एक बात जो सबसे बडी उभर कर सामने आ रही है वह है कर्मठ,समर्पित कार्यकर्ता की उपेक्षा यानि नींव के पत्थरों की अवहेलना और तथाकथित व्यक्ति चरण वंदना में लगे रहने वाले कंगूरों का सम्मान जिसके चलते जहां वास्तविक कार्यकर्ता तठस्थ हो रहा है तो वहीं जनता में कंगूरों की कारगुजरियांे ने नकारात्मक स्थिति को निर्मित कर दिया है। अनेक जगहों पर निर्वाचित जनप्रतिधियों के परिजनांे की कारगुजरियों का परिणाम भी पार्टी के लिये विपरीत स्थिति निर्मित कर रहा है? भाजपा संगठन ने इसके लिये विभिन्न प्रकार की रणनीति बनाते हुये कार्य प्रारंभ कर दिया जिसमें मनाने थपाने का कार्य भी सम्मिलित है।
परिवारवाद के चलते भी भाजपा का नुकसान -
प्रदेश में भाजपा की पराजय के पीछे नेता पुत्रों के अचानक मैदान में आने और उनको स्थापित करने के लिये नेताओं और उनके कुछ समर्थकों के चलते भी माहौल गडबडाया। राजनीति के जानकारों की माने तो दरसल नेता पुत्रों की सिर्फ इसी बात से पहचान होना कि वह फलां नेता का पुत्र है और बने बनाये प्लेटफार्म पर आकर बैठ रहा है भी एक महत्वपूर्ण कारण कहा जा सकता है। जबकि फर्श बिछाकर विषम परिस्थिति में भी दशकों से कार्य करने वाले अनेक कार्यकर्ताओं के मन में कहीं न कहीं आत्मगिलानी या उपेक्षा का कारण बन रहा है? जिसके चलते प्रदेश में एैसे अनेक स्थानों पर परिक्रमा नहीं करने वालों के विरूद्ध पार्टी के ही चर्चितों द्वारा परेशान करने के मामले प्रकाश में आते ही रहते है?

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