बनाओ मिटाओ के खेल में करोडों की खिलती फाग
खुदती सडकें,डलते पाईप और कलेक्टर का आदेश
( डा.एल.एन.वैष्णव )
दमोह/
01-04-2017 कब कहां क्या बन जाये और क्या मिटा दिया जाये यह बात कोई नहीं जानता हां
इस बनाओ मिटाओ की राजनीति में करोडों रूपयों की फाग जरूर खिलती देखी जा
सकती है? जी हां यह वह सच्चाई है जिसमें नगर में विकास के नाम पर बलिदान और
बंदरबांट कितना हुआ और कहां हो रहा है आये दिन चर्चाओं में आता ही रहता
है। सडकों के चैडीकरण के नाम पर प्राचीन विशाल वृक्षों की कुरबानी और कुछ
महिनों पूर्व ही बनी सडकों को पाईप लाईन बिछाने के नाम पर खोदने को लेकर
तरह-तरह की चर्चायें व्याप्त हैं? “खाता न बही जो हम कहें वह सही” की कहावत
को चरितार्थ करने की बात भी लोगों के मध्य बनी हुई है। विदित हो कि नगर के
मध्य नवनिर्मित सडकों को खोदने का क्रम जारी है। जिसके चलते आवागमन में
बाधा तो उत्पन्न हो ही रही है साथ में जमकर धूल उड रही है। कहने का मतलब
फिर वहीं पहुंच रहे हैं जहां पूर्व में थे वही धूल और गढ्ढे वाली सडकों के
दिन लोटने लगे हैं। वृक्षों एवं सरोवरों के मामलों में क्या हुआ किसी से
छिपा नहीं है।कौन है जिम्मेदार-
चिंतन की बात तो यह है कि इस सबके
लिये जिम्मेदार कौन? जिनके कंधों पर निर्माण की गुणवत्ता,समय सीमा में
कराने की है वह या फिर वह जिनको मतदाताओं ने अपना प्रतिनिधि चुना है? विकास
के नाम पर अरबों खर्च होने पर भी कुछ खास परिणाम नहीं दिखना इस बात का
उदारण कहे जा सकते हैं। कब कहां कौन कार्य कर रहा है या किस एजेंसी से हो
रहा है उसकी समय सीमा,लागत,ठेकेदार के बोर्डों को कहां लगाया गया है या
जाता है? इस बात पर क्या आदेश देने वाले कलेक्टर की नजर पडी या फिर किसी जन
प्रतिनिधि ने इस ओर ध्यान दिया? जानकारों की माने तो डामर की सडक को
दुरूस्त नहीं किया जा सकता जब छोटे-छोटे गढ्ढे भरने पर लगातार सुरसा के
मुंह की तरह विस्तार ले लेते हैं तो फिर इन गहरे गढ्ढों को दुरूस्त करने पर
यह सही रहेंगे क्या गारंटी है? जिस कंपनी ने इस मार्ग को बनाया है और उसकी
गारंटी की समय सीमा है वह रहेगी या फिर वह समाप्त हो दूसरी कंपनी की रहेगी
? जैसे अनेक प्रश्न लोगों के मध्य उपज रहे हैं जो चर्चा का विषय बने हुये
हैं?करोडों की सडक की कुर्बानी-
नगर में पेयजल समस्या के निदान को
लेकर करोडों रूपयों की कुछ माह पूर्व ही निर्मित सडक को करोडों रूपयों की
पेयजल योजना को लेकर खोदने का क्रम जारी है। मामला हास्यापद और प्रश्नों को
उपजाने वाला हो जाता है कि क्या जल संकट इसके पूर्व नहीं था ? विदित हो कि
तीन गुल्ली से लेकर कटनी तक शहर के मध्य होते हुये बंसल कंपनी ने एक हाईवे
का निर्माण किया था तो वहीं हटा नाके से लेकर जबलपुर नाके के मध्य सडक का
निर्माण एक अन्य कंपनी द्वारा किया गया था। बतलादें कि इस दौरान न तो
विधायक, नगर पालिका अध्यक्ष,सांसद बदले और न ही भाजपा की सरकार कहने का
मतलब सब कुछ वही है जो इसके पहिले था। फिर भी इस ओर ध्यान नहीं देना कि
सडकों के निर्माण के पूर्व पाईपों को डाल करोडों रूपयों के नुकसान एवं समय
दोनो को बचाया जा सकता था परन्तु एैसा क्यों नहीं किया गया यह तो संबधित ही
जाने परन्तु अगर देखा जाये तो कुर्बानी के साथ ही जनता के करोडों रूपयों
के पैसों की फाग जरूर खेली गयी जो कि इस समय उसी मतदाताओं के मध्य चर्चा
में है जो कि जन प्रतिनिधियों को अपने मताधिकार का प्रयोग कर चुनती है।
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